बोजो एक, रूप अनेक
किसी गुलशन को गुलाब क्या दूँ,
किसी गज़ल को ख्याल क्या दूँ,
जिस परी को आते हो सभी जादू,
उसे बादल की दरी क्या दूँ।
किसी आफताब को चिराग क्या दूँ,
किसी समुन्दर को बौछार क्या दूँ,
जिसके होने भर से दिन त्यौहार लगता हो,
उसे तोहफे में सामान क्या दूँ।
जो औरों की दुआओं को हकीकत में बदलें,
उसकी सलामती के लिए आयात क्या लिखूं।
जो जीते हर बाजी हुनर से अपने,
ऐसी शख्सियत को अपनी कलम से क्या गढ़ू।
जो अकेले ही संभाल लें हर हालात बखूबी,
उसके इत्मीनान के इंतज़ाम क्या करूँ।
जो पहले से ही हो आपका लख़्त-ए-जिगर,
उसे कोई और तख्त अदा क्या करूँ।
जिसने दिए हो जीने के सलीके, सिखाए हो अनगिनत फलसफे,
उसकी शुक्रगुजार हूँ, ये उससे क्या कहूँ।
जो है मेरी ढाल, मेरी हिम्मत और सुकून,
मीलों दूर से उसके लिए कुछ खास क्या करूँ।
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